परिचय
पैसा कैसे चलता है, कैसे बचता है, कैसे बढ़ता है – ये बातें अगर आम आदमी की समझ में आ जाये तो न सिर्फ उनका अपना घर सँभलता है, बल्कि पूरा देश मज़बूत होता है। यही है वित्तीय साक्षरता। विकसित देशों में यह 50% से अधिक है, जबकि भारत जैसे उभरते देशों में यह काफी कम है। हाल के सर्वेक्षणों के अनुसार भारत में केवल 27% वयस्क ही वित्तीय रूप से साक्षर हैं। बाकी लोग या तो बैंकों से दूर रहते हैं, या महँगे सूद पर कर्ज़ लेते हैं, या फिर चिटफंड-क्रिप्टो के चक्कर में अपनी गाढ़ी कमाई डुबो देते हैं।
भारत आज दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और 2047 तक विकसित देश बनने का सपना देख रहा है। लेकिन सिर्फ नई-नई फैक्ट्रियाँ और हाईवे बनने से बात नहीं बनेगी। जब तक देश का हर नागरिक यह न समझे कि पैसा कहाँ रखना है, कहाँ लगाना है और कब “ना” कहना है, तो यह विकास ऊपरी सतह पर ही चमकता रहेगा, नीचे तक नहीं पहुँचेगा। इसीलिए वित्तीय साक्षरता आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
भारत में वित्तीय साक्षरता की वर्तमान स्थिति
शहरों में शिक्षा और वित्तीय सेवाओं की बेहतर पहुंच के कारण साक्षरता अधिक है, जबकि ग्रामीण क्षेत्र पिछड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र और दिल्ली में यह दर लगभग 40% के करीब है, जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश में 20% के आसपास। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 में स्कूलों में कंप्यूटर की उपलब्धता 2019-20 के 38.5% से बढ़कर हाल के वर्षों में 57.2% होने की बात कही गई है, जो अप्रत्यक्ष रूप से वित्तीय साक्षरता को बढ़ा सकती है। फिर भी कुल साक्षरता 23-27% ही है, जबकि सामान्य साक्षरता दर 77-78% है
NCFE का सर्वे कहता है कि ब्याज की गणना और महँगाई का असर सिर्फ 42-43 प्रतिशत लोग ही ठीक से समझ पाते हैं। म्यूचुअल फंड, शेयर बाज़ार, पेंशन प्लान जैसी चीज़ें तो सिर्फ 4-5 प्रतिशत लोगों की समझ में आती हैं। यही वजह है कि छोटी-छोटी ठगी में लाखों-करोड़ों डूब जाते हैं।
व्यक्तिगत वित्त और आर्थिक भागीदारी पर प्रभाव
जरा सोचिए –
अगर एक गाँव की 100 महिलाएँ हर महीने 500 रुपये भी सही जगह लगाना सीख जाएँ, तो 10 साल बाद उनके पास बिना किसी कर्ज़ के 8-10 लाख रुपये इकट्ठे हो सकते हैं। यही पैसा अगर बैंक और मार्केट में जाता है, तो वो कंपनी को लोन बनता है, कंपनी नई मशीन लगाती है, नौकरियाँ बढ़ती हैं, टैक्स आता है, सरकार स्कूल-हॉस्पिटल बनाती है। यानी एक महिला की छोटी सी समझदारी पूरे देश को मज़बूत बनाती है।
आजकल तो UPI से पैसे भेजना हर किसी को आता है, पर यह समझना कि क्रेडिट कार्ड की EMI पर 36-40% ब्याज लग रहा है, बहुत कम लोगों को आता है। नतीजा – युवा 25-30 साल की उम्र में ही कर्ज़ के बोझ तले दब जाते है।
मार्च 2025 तक भारत का वित्तीय समावेशन सूचकांक 67 था, जो प्रगति तो दर्शाता है, पर कम साक्षरता और वित्तीय उपकरणों की सीमित पहुंच बाधाएँ बनी हुई हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में अपार संभावनाएँ हैं, पर अपर्याप्त वित्तीय शिक्षा विकास को असमान बना रही है।
वित्तीय समावेशन में सरकार की भूमिका
वित्तीय समावेशन और वित्तीय साक्षरता एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। सेवाओं तक पहुंच होने पर भी समझ न हो तो समावेशन सतही रह जाता है। सरकार ने इसे समझते हुए साक्षरता को समावेशन प्रयासों में एकीकृत किया है।
2014 में शुरू की गई प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY) ने 50 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले, शून्य-शेष खातों और जुड़े बीमा के साथ समावेशन को बढ़ाया। ग्लोबल फिंडेक्स 2025 के अनुसार भारत में 89% नागरिकों पास बैंक खाते हो गए हैं | इसके अलावा सरकार ने अटल पेंशन योजना, राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, सेवानिवृत्ति बचत और बीमा को प्रोत्साहित किया हैं। इन योजनाओं में साक्षरता के तत्व शामिल हैं।
RBI हर साल फाइनेंशियल लिटरेसी वीक मनाता है, बैंक वाले गाँव-गाँव जाकर कैंप लगाते हैं, पर अभी भी ज़्यादातर कैंप में पहुँच सिर्फ़ फॉर्म भरवाने तक सीमित रहती है। असली समझ नहीं आती।
चुनौतियाँ
1. स्कूल में आज भी “ब्याज कैसे निकालते हैं” सिखाया जाता है, पर “क्रेडिट कार्ड का बिल समय पर क्यों भरना चाहिए” नहीं सिखाया जाता।
2. गाँव में इंटरनेट है, पर भरोसा नहीं। लोग फोन पर आए मैसेज को “बैंक वाला” समझकर अपना OTP दे देते हैं।
3. ग्रामीण औरतें घर चलाती हैं, पर पैसे की बात में उनकी आवाज़ कम सुनी जाती है।
4. भाषा की समस्या – ज्यादातर कंटेंट अंग्रेज़ी में है, या बहुत भारी-भरकम हिंदी में।
कुछ उम्मीद की कहानियाँ
कर्नाटक के एक गाँव में सेल्फ-हेल्प ग्रुप की महिलाओं को 6 महीने का बेसिक कोर्स करवाया गया। आज वो अपना बिज़नेस चला रही हैं, बैंक से लोन ले रही हैं और बेटियों की शादी के लिए खुद SIP कर रही हैं।
पंजाब के कुछ गाँवों में स्कूल के बच्चों को हर शनिवार “पैसा बोलता है” नाम से क्लास लगती है – खेल-खेल में ही बच्चे बजट, बचत, निवेश समझ जाते हैं। अब वो अपने माता-पिता को समझाते हैं कि चिटफंड में पैसा न डालें।
भविष्य का परिदृष्य
- दसवीं-बारहवीं के सिलेबस में एक पूरा सब्जेक्ट “पर्सनल फाइनेंस” का होना चाहिए – मार्क्स भी मिलें।
- गाँव की चौपाल पर, बस स्टैंड पर, मंदिर के बाहर – 15 मिनट की छोटी-छोटी कहानियाँ हिंदी और लोकल भाषा में चलनी चाहिए।
- यूट्यूब, इंस्टाग्राम रील्स का सही इस्तेमाल हो – आज का युवा वहीं से सीखता है।
- हर पंचायत में एक “वित्तीय दोस्त” नियुक्त हो – जिससे बिना झिझक कोई भी सवाल पूछ सके।
निष्कर्ष
अगर भारत को सच में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना है, तो सिर्फ़ अडानी-अंबानी का पैसा नहीं, हर घर का 5-10 हज़ार रुपये भी सही जगह लगना चाहिए। वो तभी लगेगा जब हर हिंदुस्तानी को यह समझ आ जाए कि पैसा उसका गुलाम है, मालिक नहीं।
वित्तीय साक्षरता कोई लग्ज़री नहीं, हमारे देश की बुनियाद है। यह व्यक्तिगत सशक्तिकरण, समावेशी विकास और आर्थिक सुदृढ़ता बढ़ाती है तथा सतत विकास का मार्ग प्रशस्त करती है। वित्तीय साक्षरता को प्राथमिकता देकर भारत अपने आर्थिक स्वप्नों को साकार कर सकता है और प्रत्येक नागरिक को समृद्धि का हिस्सेदार बना सकता है।
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