नई दिल्ली का वह हिस्सा, जो इंडिया गेट से शुरू होकर संसद भवन तक जाता है, सिर्फ सड़क या इमारतों का समूह नहीं है। यह भारत की आधुनिक राजधानी की आत्मा है, जहाँ इतिहास, शक्ति, लोकतंत्र और आम आदमी की आकांक्षाएँ एक साथ चलती हैं। मेरी नज़र में यह रास्ता सिर्फ पत्थर और संगमरमर का नहीं, बल्कि समय की कहानी है—औपनिवेशिक सत्ता से स्वतंत्र भारत तक, राजपथ से कर्त्तव्यपथ तक की यात्रा।
जब मैं इंडिया गेट के पास खड़ा होता हूँ, तो सबसे पहले दिमाग में प्रथम विश्व युद्ध के शहीदों की याद आती है। 1931 में एडविन लुटियंस की योजना के तहत बने इस स्मारक पर उन हजारों भारतीय सैनिकों के नाम अंकित हैं, जो ब्रिटिश सेना के साथ लड़े और शहीद हुए। बाद में अमर जवान ज्योति ने इसे स्वतंत्र भारत के शहीदों का भी प्रतीक बना दिया। शाम के समय जब लाइट जलती है तो लगता है कि यह जगह दुख और गर्व दोनों को एक साथ समेटे हुए है।
इंडिया गेट से शुरू होता है कर्तव्य पथ। पहले इसे राजपथ कहा जाता था। नाम बदलने के साथ ही मंशा भी बदली। अब यह सिर्फ राजाओं या शासकों का रास्ता नहीं, बल्कि कर्तव्य का रास्ता है। दोनों तरफ हरे-भरे लॉन, पानी के फव्वारे, और दूर तक फैली सड़क। गणतंत्र दिवस पर यहाँ परेड निकलती है—सैनिक, टैंक, मिसाइल, और विभिन्न राज्यों की झाँकियाँ। लेकिन बाकी दिनों में यह रास्ता शांत रहता है। सुबह जॉगर दौड़ते हैं, शाम को लोग सैर करते हैं। सेंट्रल विस्टा परियोजना के बाद यह और भी भव्य हो गया है। साफ-सुथरे फुटपाथ, बेहतर रोशनी, और व्यवस्थित हरियाली। कुछ लोग इसे विलासिता कहते हैं, कुछ कहते हैं कि यह राष्ट्र की गरिमा का प्रतीक है। मेरी नज़र में दोनों बातें सही हैं। एक लोकतांत्रिक देश को अपने प्रतीकों को गरिमापूर्ण रखना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आम आदमी के लिए जगह बनी रहे।
कर्तव्य पथ के दोनों तरफ उत्तर और दक्षिण ब्लॉक की विशाल इमारतें खड़ी हैं। ये लुटियंस और हर्बर्ट बेकर की सोच का नतीजा हैं। लाल पत्थर की ये इमारतें ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति का प्रतीक थीं। आज भी यहाँ से देश का प्रशासन चलता है। इन इमारतों को देखकर लगता है कि सत्ता कितनी स्थायी और कितनी नाजुक होती है। एक तरफ ये इमारतें सदियों तक खड़ी रहेंगी, दूसरी तरफ उनके अंदर बैठे लोग हर कुछ साल में बदल जाते हैं।
आगे बढ़ने पर नजर पड़ती है राष्ट्रपति भवन पर। यह भी लुटियंस की कृति है। विशाल गुंबद, बाग-बगीचे, और वह ऊँचाई जो सत्ता की दूरी बताती है। स्वतंत्रता के बाद यह वायसराय हाउस से राष्ट्रपति भवन बन गया। यह बदलाव सिर्फ नाम का नहीं था। विदेशी शासन की जगह भारतीय लोकतंत्र ने ले ली। लेकिन वास्तुकला वही रही। शायद इसलिए कि इतिहास को मिटाने से बेहतर है उसे अपना बनाना।
और फिर आता है संसद भवन। पुराना संसद भवन गोल आकार का है, जिसे बेकर ने डिजाइन किया था। यह लोकसभा और राज्यसभा का घर रहा। यहाँ कानून बने, बहस हुई, कभी हंगामा हुआ, कभी ऐतिहासिक फैसले लिए गए। 2023 में नया संसद भवन बनने के बाद पुराना भवन भी इतिहास का हिस्सा बन गया, लेकिन उसकी अहमियत कम नहीं हुई। संसद मेरी नज़र में भारत का सबसे जीवंत स्थान है। यहाँ विभिन्न भाषाएँ, विचारधाराएँ, जातियाँ और वर्ग एक साथ बैठते हैं। कभी शोर होता है, कभी सन्नाटा। कभी विपक्ष जोर से बोलता है, कभी सत्ता पक्ष। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है—अपूर्ण, शोरगुल भरा, लेकिन जीवित।
इस पूरे रास्ते को देखकर मुझे लगता है कि नई दिल्ली की कहानी सिर्फ इमारतों की नहीं है। यह कहानी उन लाखों लोगों की भी है जो यहाँ काम करते हैं, घूमते हैं, या बस गुजरते हैं। यहाँ पर्यटक आते हैं—भारतीय और विदेशी। यहाँ प्रदर्शन होते हैं। कभी किसान आंदोलन, कभी छात्र, कभी कोई और मुद्दा। इंडिया गेट के पास और कर्तव्य पथ पर प्रदर्शनों ने कई बार इतिहास रचा है। सत्ता के केंद्र के इतने करीब आम आदमी की आवाज उठना, यही लोकतंत्र की ताकत है।
सेंट्रल विस्टा परियोजना ने इस क्षेत्र को नया रूप दिया है। नए भवन, बेहतर सड़कें, और एक समग्र दृष्टि। कुछ लोग इसे राजनीतिक परियोजना कहते हैं, कुछ राष्ट्रीय गौरव। मेरी नज़र में कोई भी बड़ा शहर या राजधानी समय के साथ बदलती है। पेरिस, लंदन, वाशिंगटन—सबने अपने स्मारकों और रास्तों को संवारा। दिल्ली भी संवर रही है। लेकिन बदलाव के साथ यह ध्यान रखना जरूरी है कि इतिहास मिटे नहीं, और आम आदमी की पहुँच बनी रहे।
इस रास्ते पर खड़े होकर मैं अक्सर सोचता हूँ कि सौ साल पहले यहाँ क्या रहा होगा। ब्रिटिश अधिकारी घोड़े पर सवार, भारतीय कर्मचारी, और दूर कहीं गांव। फिर 1947 आया। स्वतंत्रता। नेहरू, गांधी की विरासत। फिर आपातकाल, गठबंधन सरकारें, आर्थिक उदारीकरण, और अब डिजिटल भारत। हर युग ने इस रास्ते पर अपनी छाप छोड़ी। गणतंत्र दिवस की परेड में झाँकियाँ बदलती रहीं—कभी कृषि, कभी उद्योग, कभी अंतरिक्ष, कभी आत्मनिर्भर भारत।
आज जब मैं इस पूरे इलाके को देखता हूँ तो लगता है कि नई दिल्ली की यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। नई इमारतें बन रही हैं, पुरानी संभाली जा रही हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में हरियाली बचाना, पर्यटन को बढ़ावा देना, और सुरक्षा बनाए रखना—सब चुनौतियाँ हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि यह जगह अभी भी जीवित है। बच्चे यहाँ खेलते हैं, प्रेमी घूमते हैं, बुजुर्ग बैठते हैं, और राजनीतिक चर्चाएँ होती हैं।
इंडिया गेट से संसद तक का यह सफर मेरे लिए भारत की यात्रा का प्रतीक है। युद्धों की याद से शुरू होकर लोकतंत्र के मंदिर तक। औपनिवेशिक योजना से शुरू होकर भारतीय पुनर्व्याख्या तक। यह रास्ता हमें याद दिलाता है कि इतिहास को नकारने की बजाय उसे समझना और आगे बढ़ना बेहतर है। मेरी नज़र में नई दिल्ली की सबसे खूबसूरत बात यही है—यह कभी भी सिर्फ सत्ता का शहर नहीं रहा। यह हमेशा आम लोगों, यादों, और आकांक्षाओं का शहर भी रहा है। और जब तक यह संतुलन बना रहेगा, यह रास्ता भारत की कहानी सुनाता रहेगा।
कुणाल कुमार
प्रबंधक, आयोजना विभाग
नई दिल्ली अंचल
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